गुरुवार, 26 मार्च 2020

190. कोरोना बम



(इस ब्लॉग पर मैंने 2015 से लिखना बन्द कर दिया था और कुछ समय बाद इसे छुपा ही दिया था। अचानक क्या मन में आया, आज 5 साल बाद निम्न पोस्ट को लिखते हुए मैं इसे फिर से सार्वजनिक कर रहा हूँ।)

       एक शब्द है- खटका
नोटबन्दी की घोषणा के बाद हमें एकबारगी लगा था कि क्या वाकई हमारी सरकार कालेधन और नकली नोट के खिलाफ जंग का ऐलान करने जा रही है? तीसरे दिन दो हजार के नये नोट पर हमने उर्जित पटेल के हस्ताक्षर देखे और एक खटका लगा। यह कैसे हो सकता है? मुद्रा बदलना तो लम्बी प्रक्रिया है, फिर चन्द रोज पहले गवर्नर बने व्यक्ति के हस्ताक्षर नोट पर भला कैसे? बाद के दिनों में खटका सही साबित हुआ। "बिना तैयारी" और "गलत नीयत" के साथ उठाया गया यह एक भयंकर गलत कदम था!
...उसी प्रकार, कोविड- 19 वायरस की खबर पर पहली प्रतिक्रिया यही थी कि यह प्रकृति का दण्ड है- खासकर, मनुष्य के गलत खान-पान के खिलाफ। बताया जा रहा था कि यह वायरस चमगादड़ से मनुष्य में आया है और चीन में चमगादड़ खाने का फैशन शुरु हो चुका था। कुछ दिनों बाद पता चला कि चीन दस दिनों के अन्दर एक बड़ा अस्पताल बनाने जा रहा है। थोड़ा-सा खटका लगा- यह भला कैसे सम्भव है? फिर पता चला, यह वायरस बूढ़े, बीमार, कमजोर लोगों के लिए जानलेवा है और युवा एवं मजबूत लोगों के लिए नहीं। फिर एक खटका लगा- ऐसा "प्राकृतिक" रुप से हो रहा है?  
अब यह खटका सही साबित होने जा रहा है। यह "कोविड-19" कोई वायरस नहीं है, बल्कि बम है- "कोविड-19 बम" या "कोरोना बम"!
***
नीचे कुछ विन्दु दिये जा रहे हैं। इन्हें अपने तरीके से मिलाने की कोशिश कीजिए- शायद कोई तस्वीर उभरे:
विन्दु#1 द्वितीय विश्वयुद्ध के अन्त में जापान पर परमाणु बम गिराकर अमेरिका दुनिया का चौधरी बना था। जर्मनी-इटली आत्मसमर्पण कर चुके थे। दो हफ्ते की लड़ाई के बाद जापान भी घुटने टेकने वाला था। वैसे, जापान ने आत्मसमर्पण का सन्देश अमेरिका के पास भेज दिया था कि अगर जापान के राजा को युद्धापराधी न ठहराया जाय, तो वह समर्पण कर देगा। मगर अमेरिका ने जबर्दस्ती जापान पर दो परमाणु बम गिरा दिये। क्यों? ताकि सोवियत संघ दुनिया का चौधरी न बन जाय!
क्या अभी फिर कोई एक घातक बम दुनिया पर गिराकर दुनिया का चौधरी बनना चाह रहा है?
विन्दु#2 HIV वायरस के बारे में बताया गया था कि यह एक प्रकार के चिम्पाजी से मनुष्य में आया है और इसके लिए अफ्रीकी लोगों को बदनाम किया गया था कि उनलोगों से चिम्पाजी के साथ यौन-सम्बन्ध बनाये होंगे। बाद में पता चला कि अमीर देशों की ओर से कुछ अफ्रीकी इलाकों में एक टीकाकरण अभियान चलाया गया था। इस वैक्सीन को बनाने के लिए चिम्पाजी के शरीर से कोई तत्व लिया गया था। यानि यह एक षड्यंत्र था- मनुष्य के अन्दर जानवरों के एक खतरनाक वायरस को प्रतिरोपित करने का, ताकि वायरस फैलने के बाद कुछ बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ मुनाफा कमा सके। ध्यान रहे, आज की तारीख "हथियार लॉबी" जितनी ताकतवर है दुनिया में, "चिकित्सा लॉबी" भी उतनी ही ताकतवर है।
क्या फिर कोई ऐसी ही खतरनाक चाल चलने की सोच रहा है?
विन्दु#3 हॉलीवुड की फिल्मों के अनुसार कोई "वायरस" और उसका "वैक्सीन"- दोनों बनाता है, फिर "वायरस" को फैलाता है और जब दुनिया तबाही की कगार पर पहुँचने लगती है, तो वैक्सीन को बेचकर मुनाफा कमाता है। कुछ फिल्मों का एक और कॉन्सेप्ट है कि कोई दुनिया की आबादी के बड़े हिस्से को पलक झपकते मार डालना चाहता है और यह सोचता है कि ऐसा करके वह दुनिया की भलाई कर रहा है।
क्या कोई इन विचारधाराओं से प्रेरित होकर काम कर रहा है?
विन्दु#4 नागालैण्ड में एक जगह है- मिमी, जहाँ की गुफाओं में चमगादड़ बहुतायात में पाये जाते हैं। आदिवासियों की एक प्रजाति (Yimchungru tribe) साल में एकबार उत्सव के रुप में इनका शिकार करती है- खाती भी है। चमागादड़ों में न केवल कोरोना, बल्कि इबोला के भी विषाणु पाये जाते हैं, मगर नागालैण्ड के उस इलाके में कभी ऐसी कोई महामारी नहीं फैली। सोचिए- इसका कारण क्या हो सकता है? सिम्पल- उन आदिवासियों के शरीर में कोई ऐसा प्रतिरोधक तत्व है, जो शरीर के अन्दर चमागादड़ के वायरस से निपट लेता है। यह कोई बड़ी बात नहीं है। चूँकि वे लोग पिछली बहुत पीढ़ियों से चमगादड़ खा रहे होंगे, इसलिए उनके शरीर के अन्दर ऐसी खास प्रतिरोधक क्षमता पैदा हो गयी है।
2013-16 में इबोला अफ्रिका में फैला था, इसलिए वैज्ञानिक जानना चाहते थे कि नागालैण्ड के उन आदिवासियों में इबोला क्यों नहीं फैलता? वैज्ञानिक तो ऐसा सोचेंगे ही, क्य़ोंकि उन्हें तो इबोला का टीका बनाना था। तो 2017 में 12 शोधकर्ताओं का एक दल नागालैण्ड आता है और 85 ऐसे आदिवासियों के शरीर से नमूने लेकर जाता है, जिन लोगों ने 11 बार से ज्यादा इस वार्षिक चमगादड़ शिकार उत्सव में भाग लिया था। इनकी उम्र 18 से 50 के बीच थी। कुछ चमगादड़ भी वे लेकर जाते हैं। 
वैज्ञानिक तो बेचारे इबोला का टीका बनाने की कोशिश कर रहे होंगे, मगर एक "शातिर दिमाग" राजनीतिज्ञ क्या सोचेगा? यही न कि क्यों न चमगादड़ से "वायरस" लिया जाय और आदिवासियों के शरीर से उस वायरस का "एण्टीडोट" लिया जाय... और "परमाणु बम"-जैसा प्रयोग करके देखा जाय... ? क्या एक शातिर दिमाग इतना भी नहीं सोच सकता?
विन्दु#5 यह कोई गुप्त शोध नहीं था। ये 12 शोधकर्ता निम्न संस्थाओं से थे- Tata Institute of Fundamental Research, the National Centre for Biological Sciences (NCBS), the Wuhan Institute of Virology, the Uniformed Services University of the Health Sciences in the U.S. and the Duke-National University in Singapore। बदनाम वुहान से 2 वैज्ञानिक थे। शोध की एक रपट the PLOS Neglected Tropical Diseases journal में प्रकाशित भी हुई थी- बीते अक्तूबर में। यह जर्नल मूलरुप से the Bill and Melinda Gates Foundation द्वारा स्थापित है।
यानि शोध के "नमूने" चार देशों की प्रयोगशालाओं में मौजूद हैं- भारत, अमेरिका, सिंगापुर और चीन। अब बताईए कि इन चार देशों में से किस देश का मुखिया "शातिर" भी है और दुनिया का "चौधरी" भी बनने की चाहत रखता है? दिमाग पर जोर डालने की जरुरत है? बिलकुल नहीं। उत्तर है- अमेरिका और चीन। अमेरिका वर्तमान में चौधरी है और चीन चौधरी बनने की जल्दीबाजी में है।
क्या अमेरिका और चीन- दोनों शोध की आड़ में "कोरोना बम" बनाने की कोशिशों में लगे हुए थे?
विन्दु#6 हिटलर के नाज़ी वैज्ञानिकों को भी पता चल गया था कि परमाणु ऊर्जा का इस्तेमाल बम बनाने में हो सकता है और वे भी कोशिशों में लगे हुए थे। यानि 'मैनहटन प्रोजेक्ट' के अलावे जर्मनी में भी परमाणु बम बनाने की कोशिश चल रही थी। बाजी मारा मैनहटन प्रोजेक्ट, यानि अमेरिका ने।
क्या वैसा ही कुछ चल रहा था चीन और अमेरिका के बीच "कोरोना बम" को लेकर कि पहले कौन बम बनाता है? ध्यान रहे, यहाँ "एण्टीडोट" ज्यादा महत्वपूर्ण है। इस बम का इस्तेमाल वही "पहले" कर सकता था, जिसने "एण्टीडोट" यानि कोविड- 19 का वैक्सीन भी बना लिया हो!
बहुत ही सिम्पल कैलकुलेशन- चीन ने पहले "कोरोना बम" का इस्तेमाल किया, इसलिए तय है कि एण्टीडोट यानि कोविड- 19 का वैक्सीन बनाने में उसने बाजी मार ली है! अमेरिका पिछड़ गया है।
विन्दु#7 चीन ने कहा कि बीते अक्तूबर में वुहान में जो "मिलिटरी गेम्स" आयोजित हुए थे और उसमें भाग लेने जो 300 अमेरिकी सैनिक आये थे, उन्हीं लोगों ने इस वायरस को फैलाया। कहा जा रहा था कि अमेरिकी सैनिक सुस्त लग रहे थे और अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पा रहे थे।
अगर चीन का यह आरोप सही है, तो अमेरिका के पास इसका वैक्सीन होना चाहिए। और अगर वैक्सीन होता, तो अमेरिकी राष्ट्रपति पीड़ितों का हाल-चाल लेने जरुर निकलते। वे तो नहीं निकल रहे। मगर चीन वालों, आपके राष्ट्रपति तो निकले थे पीड़ितों का हाल-चाल लेने- वह भी मामूली-सा "मास्क" लगाये! जबकि उन्हें तो सिर से पाँव तक ढका होना चाहिए था। यानि कि वे "वैक्सीन" ले चुके हैं और निश्चिन्त हैं! है कि नहीं?
क्या यह आकलन गलत है? अगर गलत लगता है, तो अगला पारा पढ़ लीजिये-
विन्दु#8 वुहान के अस्पताल में जब डॉक्टरों ने मरीजों में एक नया वायरस पाया, तब एक डॉक्टर को अफवाह फैलाने के जुर्म में गिरफ्तार किया गया और बाकियों को चुप रहने कहा गया। ऐसा क्यों? क्या बीमारी को "फैलाने" के लिए ऐसा नहीं किया गया?
बीमारी कायदे से फैल जाने के बाद चीन 10 दिनों के अन्दर एक अस्पताल बनाकर दुनिया को दिखा देता है- जाहिर है, "पहले से" कुछ तो तैयारी रही ही होगी!
रूस और उत्तर कोरिया में यह बीमारी नहीं के बराबर फैलती, क्योंकि दोनों चीन के "गहरे" एवं "असली" मित्र हैं। यह बिलकुल चमत्कार तो नहीं ही हो सकता! तैयारी पहले से रही होगी
चीन की राजधानी बीजिंग और आर्थिक राजधानी शंघाई तक यह बीमारी लगभग नहीं पहुँचती। वुहान का मछली बाजार पहले से (कु)प्रसिद्ध था, वहीं फैलाया गया, वहीं के विडियो चीन ने जारी होने दिये, ताकि वायरस का प्रकोप ज्यादातर लोगों को "प्राकृतिक" लगे। वैसे, दोष तो उसने अमेरिका पर मढ़ दिया है।
चीन के राष्ट्रपति जब कोरोना-प्रभावित इलाकों का दौरा कर रहे थे, तब उन्होंने RM1 श्रेणी का मास्क पहन रखा था, जबकि डॉक़्टर आपादमस्तक ढक कर काम कर रहे थे। जाहिर है, वे सुरक्षित महसूस कर रहे थे। क्या बिना वैक्सीन के यह सम्भव है?
चीन का कोई VIP किस्म का व्यक्ति इस वायरस से प्रभावित नहीं हुआ, जबकि ब्रिटेन के प्रिन्स चार्ल्स तक प्रभावित हो गये हैं। कोई चमत्कार है... या वैक्सीन का कमाल है?
बीमारी फैली, आपने तुरत-फुरत में नियंत्रित किया और अब वुहान शहर खुलने वाला है। "पहले से" अगर तैयारियाँ न हो, तो यह सम्भव नहीं लगता। Everything was planned...
सबका शेयर बाजार ध्वस्त हो गया, चीन के शेयर बाजार का बाल भी बांका न हुआ। बिना तैयारी के यह सम्भव था?
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हथियारों से अमेरिका से लड़ना बुद्धिमानी नहीं थी। इसलिए "कोरोना बम" का इस्तेमाल हुआ। आने वाले समय में शायद चीन दुनिया का चौधरी बन जाय और आर्थिक महाशक्ति भी!
अब कोई यह बचकाना सवाल न पूछे कि चीन ने अपने लोगों को क्यों मरवाया? क्या भूल गये कि यह वायरस कमजोरों, बीमारों, वृद्धों के लिए जानलेवा है और स्वस्थ एवं युवा व्यक्ति बमुश्किल 1 प्रतिशत मारे गये होंगे। इसी तीर से अगर चीन ने अपने एक-डेढ़ करोड़ "कमजोर-बीमार-वृद्ध" आबादी से छुटकारा पा लिया, तो क्या "शातिर दिमाग" वाले राजनीतिज्ञ के लिए यह फायदे का सौदा नहीं है? क्या कहा, मात्र तीन हजार चीनी मारे गये हैं? हो सकता है। मगर जब रिपोर्ट घूम रही है कि चीन में जनवरी से मार्च के बीच डेढ़ करोड़ सिम "निष्क्रिय" हो गये हैं, तो शक क्यों न किया जाय कि दाल में कुछ काला है?
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खण्डन:
ये विचार (दिमागी) "लॉक-डाउन" के दौरान उपजे हैं, इन्हें "सत्य" मानने की जरुरत बिलकुल नहीं है। ये विचार बस "यूँ ही- " किस्म के हैं। ज्यादा-से-ज्यादा इन्हें एक "भावी" फिल्म की पटकथा का "प्लॉट" समझा जा सकता है। इस कहानी में यह दिखाया जा सकता है कि एक भारतीय वैज्ञानिक (भारतीय प्रयोगशाला में रखे 'नमूनों' से) कोविड- 19 का टीका बनाने की कोशिश कर रहा है, कुछ भारतीय राजनीतिज्ञों के माध्यम से चीन अड़ंगा डाल रहा है, फिर भी वह सफल हो जाता है 


पुनश्च:

एक बात है कि अगर यह वायरस-प्रकोप "प्राकृतिक" है, यानि "चमगादड़ के सूप" के माध्यम से इन्सानी शरीर में आया है (कहीं जानकारी मिली कि जुलाई'18 से ही चीन में इस सूप को पीने का फैशन चला है), तो मुझे लग रहा है कि फिर "इबोला" वायरस इन्सानी शरीर में क्यों नहीं आया? "कोरोना" ही क्यों आया?
सोच कर देखिए, इबोला के प्रकोप में मृत्यु दर 80-90 प्रतिशत है। यानि 100 लोग अगर संक्रमित हुए, तो उनमें से 80 से 90 लोग मारे जायेंगे। दूसरी बात, इबोला जवान-बूढ़े में भेद नहीं करता। इसके मुकाबले कोरोना का यह जो "नया" संस्करण मार्केट (चिकित्सा-लॉबी के लिए यह मार्केट ही है) में आया है, उसमें मृत्यु दर काफी कम है; यह बूढ़े, बीमार, कमजोरों के लिए घातक है और स्वस्थ एवं युवा लोगों को आम तौर पर माफ कर देता है। इसी विन्दु पर मुझे खटका लगा था और मुझे इस तरह से सोचना पड़ा कि कहीं इसे प्रयोगशाला में (किसी सनकी सत्ताधारी के) कुछ खास निर्देशों के तहत तो तैयार नहीं किया गया है?  
प्रसंगवश, बता दिया जाय कि कोरोना वायरस से दुनिया 1960 से ही परिचित है। इसके इस नये संस्करण को "कोविड- 19" (कोरोना वायरस डिजीज 2019) नाम दिया गया है। चूँकि इसकी बनावट सूर्य (यानि तारों) के कोरोना-जैसी होती है, इसलिए इसे कोरोना नाम दिया गया था। कोरोना एक गैसीय संरचना है, जो तारों के चारों तरफ होती हैं- लपटों के समान। इसका अर्थ किरीट यानि मुकुट है।
 

बुधवार, 31 दिसंबर 2014

189. नये साल की (अ)शुभकामना


       साथियों, जय हिन्द। जैसा कि मैंने तय किया है, 2014 के बाद देश-दुनिया-समाज के बारे में सोच-विचार करना नहीं है। करना भी है, तो उसे अभिव्यक्ति नहीं देनी है। यानि मेरे इस ब्लॉग "देश-दुनिया" में अब लिखना बन्द। निम्नलिखित (कविता जैसी) पंक्तियों को इस ब्लॉग का अन्तिम पोस्ट माना जा सकता है।
       हालाँकि अपने, अपनों तथा अपने आस-पास के बारे में कभी-कभार मैं लिखता रहूँगा- अपने दूसरे ब्लॉग "कभी-कभार" में। और हाँ, खुद को अनुवाद के काम में व्यस्त रखूँगा।
       इति, जय हिन्द।

भगवान करे
नया साल बहुत ही अशुभ
बहुत ही अमंगलमय साबित हो
इस देश के लिए

बैंक, रेलवे, पोस्ट ऑफिस से लेकर
सेना, पुलिस, न्यायपालिका तक का
निजीकरण हो जाय।
हरेक सरकारी विभाग
सिर्फ, सिर्फ और सिर्फ
"मुनाफे" के लिए काम करे।

दुनिया के लिए यह देश
सिर्फ एक "बाजार" बनकर रह जाय
और भारत सरकार बन जाय-
गवर्नमेण्ट ऑव इण्डिया प्राइवेट लिमिटेड!
जिसमें पूँजी लगी हो
अम्बानी-अडाणी से लेकर
पेप्सी और कोका कोला तक की।

देश की निन्यानबे प्रतिशत पूँजी एवं संसाधनों पर
कब्जा हो जाय एक प्रतिशत ताकतवर लोगों का
और दाने-दाने को मोहताज हो जायें आम लोग।

इससे भी ज्यादा भयानक हो
इसका अगला साल
और फिर उससे भी भयानक हो
उसका अगला साल।
ऐसे ही चलता ही रहे
तब तक...

...जब तक कि इस देश के लोग
इस देश के आम नागरिक
और बेशक, सेनाओं के आम सैनिक
शोषण-दोहन-उपभोग पर आधारित
सड़ी-गली बदबू मारती इस औपनिवेशिक व्यवस्था को
दफनाकर या जलाकर
इसके स्थान पर
सुभाष-भगत के पदचिह्नों पर चलकर
समता-पर्यावरणमित्रता-उपयोग पर आधारित
एक नयी व्यवस्था को अपनाने के लिए
राजी नहीं हो जाते


आमीन... एवमस्तु...