रविवार, 14 सितंबर 2014

184. कोली बनाम पंढेर तथा सीबीआई


       हो सकता है, निठारी काण्ड में नौकर कोली ही दोषी हो और मालिक पंढेर निर्दोष। मगर मेरी अन्तरात्मा कहती है कि असली शिकारी मालिक पंढेर है और नौकर कोली बचे-खुचे शिकार पर गुजारा करने वाला प्राणी है!
       जैसे कि इस देश में जजों तथा सीबीआई अफसरों को छोड़कर बाकी हर कोई जानता है कि आरुषी की हत्या किसने और क्यों की, वैसे ही यहाँ भी न्यायपालिका तथा सीबीआई मिलकर मुख्य अभियुक्त को बचा रहे हैं- ऐसा मेरा सन्देह है। मेरा सन्देह तभी मिटेगा, जब नौकर कोली को एक प्रेस-कॉन्फ्रेन्स में खुलकर बोलने का मौका दिया जाय और वहाँ वह मालिक पंढेर को निर्दोष बताये!
       गौहाटी उच्च न्यायालय के एक न्यायाधीश ने अगर सीबीआई को अवैध ठहराया था, तो उन्होंने ऐसे ही यह फैसला नहीं दिया होगा। जरुर इस संस्था का जन्म किसी गलत नक्षत्र में हुआ है।
       मुझे हमेशा यही लगता है कि यह जाँच एजेन्सी मुख्य अभियुक्त को बचाना चाहती है, छोटे दोषी को फँसाती है, मामले को इतना उलझाती है कि बाद में इसका सिरा ही न मिले, मामले को तब तक लम्बा खींचती है जब तक कि लोग उसे भूलने न लगे। मुझे याद नहीं आ रहा है कि किसी बड़े मामले में इसने कभी मास्टरमाइण्ड या किंगपिन को सलाखों के पीछे तक पहुँचाया हो! शायद कुछ अपवाद भी हों, जैसे कि चारा घोटाला। मगर यह मामला भी शायद अभी खत्म नहीं है।

       वैसे दोष सिर्फ सीबीआई का नहीं है। इस सड़ी व्यवस्था में बने रहने के लिए और चारा ही क्या है? 

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