बुधवार, 17 अप्रैल 2013

124. आतंकवाद के "नाभिक" का खात्मा: एक प्रस्ताव



       आतंकवाद की जो विषबेल है, उसने करीब आधी दुनिया को अपनी चपेट में ले लिया है
       मुझे ऐसा लगता है (प्रायः सबको लगता होगा) कि इस विषबेल की जो जड़ है, इसका जो 'नाभिक' है, वह पाकिस्तान में है। पाकिस्तान में भी वहाँ की अवाम निर्दोष है- बल्कि आतंकवादियों के तालिबानी फरमानों तथा नित्यप्रति होने वाले धमाकों से वह त्रस्त है।
पाकिस्तान में "शासकवर्ग तथा सेना की गठजोड़" ही वह दुष्ट "नाभिक" है- ऐसा मुझे लगता है।
       अब मुझे यह समझ में नहीं आता है कि वह कौन-सा "गुप्त" मिशन है, जिसके तहत अमेरिका व चीन पाकिस्तान को भारी-भरकम आर्थिक मदद तथा सैन्य-सहायता दे रहे हैं? क्या ये दोनों देश "डबल गेम" खेल रहे हैं- कि पहले आतंकवादियों को हल्के स्वचालित हथियार, गोला-बारूद, विस्फोटक बेचो और फिर, इस आतंकवाद से पीड़ित देशों को भी इनसे निपटने के लिए स्वचालित हथियार, गोला-बारूद, विस्फोटक बेचो? हो सकता है कि रूस भी कुछ हद तक इस "डबल गेम" में शामिल हो- मगर वह पाकिस्तान को आर्थिक या सैन्य मदद नहीं देता- इतना तो तय है। हालाँकि अमेरिका, चीन, रूस भी आतंकवाद से ग्रस्त हैं। फिर भी, क्या पता अपने "हथियार उत्पादक लॉबी" के सामने वहाँ की सरकारें मजबूर हों? इतना तो एक बच्चा भी समझ सकता है कि आतंकवादियों के पास स्वचालित हथियार, गोला-बारूद, विस्फोटक बनाने की फैक्ट्रियाँ नहीं हैं। बेशक, वे इन्हें खरीदते ही होंगे। तो फिर, इन्हें बनाने वाला अमेरिका, चीन, रूस के अलावे और कौन हो सकता है?        
       खैर, यह राज जब खुलेगा, तब खुलेगा
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       फिलहाल मैं एक प्रस्ताव रखता हूँ आतंकवाद के "नाभिक" के खात्मे के लिए। "नाभिक" के खत्म होने के दस वर्षों के अन्दर विश्वव्यापी आतंकवाद की विषबेल भी मुर्झाकर खत्म हो जायेगी।
       प्रस्ताव यह है कि एक संयुक्त सेना का गठन कर पाकिस्तान पर आक्रमण किया जाय; उसे युद्ध में पराजित किया जाय; दुनिया के नक्शे में से "पाकिस्तान" नामक राष्ट्र को मिटा दिया जाय; वहाँ की सेना को विघटित किया जाय; वहाँ पंजाब, सिन्ध, बलूचिस्तान, पख्तूनिस्तान को राष्ट्रराज्य का दर्जा दिया जाय; अगले बीस बर्षों के लिए इन नवोदित राष्ट्रराज्यों को "सेना" का गठन न करने दिया जाय, और इस दौरान भारत को इन नये राष्ट्रों का "अभिभावक" नियुक्त किया जाय।
       बीस वर्षों के बाद अगर ये राष्ट्रराज्य अपने "रक्षा", "मुद्रा" और "विदेश" विभाग भारत को सौंप दें, तो यह एक बहुत ही अच्छा विकल्प होगा। आशा की जाय कि तब तक भारत में भी गद्दार, बे-ईमान, कायर राजनेताओं के शासन का दौर समाप्त हो चुका होगा।
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       अगर अमेरिका और चीन वाकई "डबल गेम" खेल रहे हैं, तो यह प्रस्ताव कभी लागू नहीं होगा और धीरे-धीरे सारी दुनिया इस विषबेल की चपेट में आ जायेगी।  

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