रविवार, 14 सितंबर 2014

185. तारा बनाम रकीबुल तथा व्यवस्था


       कुछ समय पहले कहीं ऐसा ही कुछ पढ़ा था कि "व्यक्ति विशेष" पर प्रतिक्रिया देना छोटी बात है; "घटना विशेष" पर प्रतिक्रिया देना मध्यम दर्जे की बात है, तथा "विचार विशेष" प्रतिक्रिया देना ऊँचे दर्जे की बात है
       जब इसे नहीं पढ़ा था, तब भी मैं व्यक्ति विशेष से जुड़ी बातों पर कुछ लिखने से बचता था; घटना विशेष पर कभी-कभार प्रतिक्रिया देता था, मगर उसी के बहाने एक विचार प्रस्तुत करने की कोशिश करता था और सिर्फ विचार विशेष पर लिखना मैं पसन्द करता था।
       खैर, तारा शाहदेव बनाम रंजीत उर्फ रकीबुल प्रकरण पर मुझे सिर्फ इतना कहना है कि यह हमारी आज की व्यवस्था का एक आदर्श उदाहरण है। कमोबेश सारे देश में ऐसी ही सड़ी-गली व्यवस्था कायम है, जिसमें रंजीत उर्फ रकीबुल जैसे माफिया के हमाम में सत्ताधारी तथा पुलिस-प्रशासन-न्यायपालिका के उच्चाधिकारी नंगे होकर नाचते हैं!
       दुःख तो यह देखकर होता है कि फिर भी हमारे देश का जागरुक वर्ग इस महान व्यवस्था पर कुर्बान हुए जा रहा है... किसी को इसकी सड़ान्ध नहीं आती!
       मुझे डर है कि इस मामले में कहीं ऐसा न हो जाये कि रंजीत उर्फ रकीबुल या तो बाइज्जत बरी हो जाये या मामूली सजा काटकर वापस आ जाये और दूसरी तरफ तारा शाहदेव को किसी झूठे मुकदमें में फँसाकर उसका जीना मुहाल कर दिया जाय...  

184. कोली बनाम पंढेर तथा सीबीआई


       हो सकता है, निठारी काण्ड में नौकर कोली ही दोषी हो और मालिक पंढेर निर्दोष। मगर मेरी अन्तरात्मा कहती है कि असली शिकारी मालिक पंढेर है और नौकर कोली बचे-खुचे शिकार पर गुजारा करने वाला प्राणी है!
       जैसे कि इस देश में जजों तथा सीबीआई अफसरों को छोड़कर बाकी हर कोई जानता है कि आरुषी की हत्या किसने और क्यों की, वैसे ही यहाँ भी न्यायपालिका तथा सीबीआई मिलकर मुख्य अभियुक्त को बचा रहे हैं- ऐसा मेरा सन्देह है। मेरा सन्देह तभी मिटेगा, जब नौकर कोली को एक प्रेस-कॉन्फ्रेन्स में खुलकर बोलने का मौका दिया जाय और वहाँ वह मालिक पंढेर को निर्दोष बताये!
       गौहाटी उच्च न्यायालय के एक न्यायाधीश ने अगर सीबीआई को अवैध ठहराया था, तो उन्होंने ऐसे ही यह फैसला नहीं दिया होगा। जरुर इस संस्था का जन्म किसी गलत नक्षत्र में हुआ है।
       मुझे हमेशा यही लगता है कि यह जाँच एजेन्सी मुख्य अभियुक्त को बचाना चाहती है, छोटे दोषी को फँसाती है, मामले को इतना उलझाती है कि बाद में इसका सिरा ही न मिले, मामले को तब तक लम्बा खींचती है जब तक कि लोग उसे भूलने न लगे। मुझे याद नहीं आ रहा है कि किसी बड़े मामले में इसने कभी मास्टरमाइण्ड या किंगपिन को सलाखों के पीछे तक पहुँचाया हो! शायद कुछ अपवाद भी हों, जैसे कि चारा घोटाला। मगर यह मामला भी शायद अभी खत्म नहीं है।

       वैसे दोष सिर्फ सीबीआई का नहीं है। इस सड़ी व्यवस्था में बने रहने के लिए और चारा ही क्या है? 

183. हथियार लॉबी


       फण्डा साफ है- पहले सउदी अरेबिया को हथियार बेचो; सउदी अरेबिया उन हथियारों के बड़े हिस्से को इस्लामिक स्टेट के आतंकवादियों को बेचेगा; ये आतंकवादी इन हथियारों से कोहराम मचायेंगे; और जब पानी नाक तक पहुँचता हुआ मालूम पड़ेगा, तब हम हथियार लेकर मैदाने-जंग में कूद पड़ेंगे- इन्सानीयत को बचाने के नाम पर! हथियारों की बिक्री से कमाई हुई अलग और इन्सानीयत के रक्षक की पहचान मिली अलग!
       यह खेल कोई पहला नहीं है। ओसामा बिन लादेन और उसके लोगों को फ्रीडम फाइटर बताते हुए पहले उसे बड़े पैमाने पर हथियार तथा पैसे दिये गये थे; बाद में (जब बेरोजगारी के दौर में जब वह भस्मासुर बन गया) उसे मारने के लिए फिर बड़े पैमाने पर पैसे तथा हथियार खर्च किये गये।
       अमेरिका सोचता था कि वह तो समुद्रों से घिरा देश है- उसे भला आतंकवाद से क्या खतरा? इसलिए यह खेल वह लम्बे समय से खेल रहा था। जब बिन लादेन ने उसकी खड़ी नाक पर डंक मारी, तब जाकर उसे पता चला कि आतंकवाद क्या होता है!
       जैसे जापान को परमाणु बम की विभीषिका क्या होती है, यह पता है और वह परमाणु बम नहीं बनाता है। वैसे ही अमेरिका को भी WTC हमले के बाद आतंकवादियों को पोसने का काम नहीं करना चाहिए था। मगर अमेरिका एक बेशर्म राष्ट्र है- पैसे और ताकत का भुक्खड़! वर्ल्ड ट्रेड सेण्टर पर इतने भीषण आतंकवादी हमले के बावजूद (इसके मास्टरमाइण्ड को मारने के कुछ समय बाद ही) वह फिर वही खेल खेलने लगा।
       कभी हमने सोचा कि आतंकवादियों के पास जो हथियार, गोला-बारूद, विस्फोटक होते हैं, वे कहाँ से आते हैं? क्या उनकी अपनी फैक्ट्रियाँ होती हैं? जी नहीं, उन्हें हथियार बेचते हैं अमेरिका, रूस, चीन-जैसे देश! हालाँकि आतंकवाद के हल्के-फुल्के दो-चार दंश इन्हें भी झेलने पड़ते हैं, मगर हथियार सेक्टर से मुनाफा इतना है कि इन दंशों को झेला जा सकता है। आखिर मरती तो आम जनता ही है! कौन-सा राजनेता मर रहा है!  
       कुल मिलाकर, इन तथाकथित सभ्य एवं विकसित देशों की हथियार लॉबी बहुत ही ताकतवर होती है, कोई भी सरकार उनके खिलाफ नहीं जा सकती; और हथियारों, गोला-बारूद तथा विस्फोटकों का मार्केट बनाये रखने के ये देश ही पहले आतंकवादियों को जन्म देते हैं, पालते-पोसते हैं, उन्हें रक्तपिपासु बनाते हैं और फिर अन्त में मैदान में उतरकर उनमें से कुछ को मारते भी हैं।

       अब सोचते रहिये कि असली आतंकवादी कौन है...  

182. काम के घण्टे

(करीब महीने भर से लिखना बन्द था। इस दौरान कई विचार दिमाग में आये और निकल गये, जो बच गये, उन्हें एक ही बैठकी में लिखे डाल रहा हूँ।)

       अरे काहे को 12-14 और 15-16 घण्टे काम!
मेरा बस चले, तो 6 घण्टे से ज्यादा काम करने वालों पर मैं जुर्माना लगा दूँ!
दिन में सिर्फ छह घण्टे काम करो और बाकी समय अपने परिजनों, नाते-रिश्तेदारों, दोस्त-यारों के साथ बिताओ; मैदान में खेलने जाओ, पार्क-जंगल में टहलने जाओ, पुस्तकालय जाओ, नहीं है कोई नाटक-कवि सम्मेलन-चित्रकला प्रदर्शनी, तो सिनेमा हॉल ही जाओ; नहीं जाना कहीं, तो घर में किताब पढ़ो, गाने सुनो, कम्प्यूटर-टीवी पर समय बिताओ... कहने का कात्पर्य कुछ भी करो, मगर खबरदार जो दफ्तर-फैक्ट्री में छह घण्टे से ज्यादा समय बिताया तो! एक बार वहाँ से निकलने के बाद वहाँ का जिक्र भी बन्द!
***
क्यों जिक्र होता है इन 12-14 और 15-16 घण्टे काम का? ताकि लोग बीमार पड़े। रक्तचाप, मधुमेह, तनाव का शिकार बने। फिर शुरु हो दवाईयों पर जीने का दौर। दवाईयाँ भी ऐसी, जो बीमारियों का ईलाज न करे- बस लोगों को जिन्दा रखे- काम करते रहने के लायक रखे! दवाईयाँ कौन बना रहा है? बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ। इनका उद्देश्य क्या है? समाजसेवा? लोगों का स्वास्थ्य?? पागल ही कोई ऐसा सोचेगा। इनका उद्देश्य है- ज्यादा-से-ज्यादा मुनाफा! इन कम्पनियों की अर्थव्यवस्था इतनी विशाल होती है, इनकी लॉबी इतनी ताकतवर होती है कि लचर व्यवस्था तथा गँवार जनता वाले देशों के शासकों-प्रशासकों-न्यायाधीशों-मीडियाधीशों को ये चुटकियों में खरीद लेती हैं!
***
जिस देश में जनसंख्या ज्यादा हो, वहाँ की कार्य-संस्कृति अलग होनी चाहिए कम जनसंख्या वाले देशों की कार्य-संस्कृति से। यहाँ वेतन कम होना चाहिए, ज्यादा-से-ज्यादा लोगों को रोजगार मिलना चाहिए, दो-तीन या चार शिफ्टों में काम होना चाहिए और जरुरत पड़ने पर रिटायरमेण्ट की उम्र घटानी चाहिए।
मगर यहाँ तो सब उल्टा हो रहा है- वेतन हद से ज्यादा दो, एक ही आदमी से दो-तीन आदमी का काम लो, सुबह से रात तक एक ही आदमी काम करे (शिफ्ट नहीं), और रिटायरमेण्ट की उम्र 60 से ज्यादा बढ़ा दो!
*****

रविवार, 10 अगस्त 2014

181. भारत की आजादी: संक्षिप्त इतिहास


स्पष्टीकरण/चेतावनी/डिस्क्लेमर: एक जिम्मेदार एवं जागरुक नागरिक होने के नाते हमारा फर्ज बनता है कि हम अपने राष्ट्रीय प्रतीकों के प्रति सम्मान व्यक्त करें, देश में कायम व्यवस्था के प्रति विश्वास व्यक्त करें, राष्ट्रीय त्यौहारों को मनायें और 15 अगस्त एवं 26 जनवरी को तिरंगा जरूर लहरायें।
नीचे जो कुछ कहा जा रहा है, उसका उद्देश्य सिर्फ इतना है कि हमें "सत्य" की जानकारी रहनी चाहिए...
***
15 अगस्त 1945 के दिन जापान के आत्म-समर्पण के बाद द्वितीय विश्वयुद्द समाप्त होता है। मित्रराष्ट्र वाले (ब्रिटेन-अमेरिका-रूस इत्यादि) विजयी होते हैं तथा धुरीराष्ट्र वाले (जर्मनी-इटली-जापान) पराजित। इस युद्ध के दौरान लॉर्ड माउंटबेटन मित्रराष्ट्र की तरफ से एशिया-प्रशान्त क्षेत्र के सर्वोच्च सेनापति होते हैं।  
       विजयी ब्रिटेन भारत में आजाद हिन्द फौज के कुछ अफसरों को फाँसी पर लटका कर ब्रिटिश भारतीय सेना के जवानों-अधिकारियों को एक कठोर सन्देश देना चाहता है कि भविष्य में ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ बगावत करने की जुर्रत कोई न करे- इसे बर्दाश्त नहीं किया जायेगा!
       मगर यह दाँव ब्रिटेन को उल्टा पड़ जाता है। भारतीय जनता आजाद हिन्द फौज के सैनिकों के पक्ष में उठ खड़ी होती है। ब्रिटिश भारतीय सेना के जवान भी सोचने को बाध्य होते हैं कि आखिर वे किसकी तरफ से किसके खिलाफ लड़ रहे थे? भारतीय शाही नौसेना की एक हड़ताल इसी समय बगावत में तब्दील हो जाती है। थल सेना में भी बगावतों का दौर शुरु होता है। भारतीय जवान अँग्रेज अधिकारियों के आदेश मानने से मना कर देते हैं।
       ***
       भारत के मुकाबले ब्रिटेन की जनसंख्या है ही कितनी? अगर ब्रिटेन के सारे युवकों को सैनिक बना दिया जाय, तो भी भारत-जैसे विशाल देश पर वह नियंत्रण नहीं रख पायेगा- यह बात ब्रिटेन अच्छी तरह से जानता था। अब तक भारतीय जवानों की "राजभक्ति" के बल पर ही वह भारत पर तथा आधी दुनिया पर राज कर रहा था। इस विश्वप्रसिद्ध "राजभक्ति" का क्षरण अब शुरु हो गया था!
       अतः विश्वयुद्ध में विजयी होने के बावजूद, बर्मा तथा सिंगापुर को फिर से आधिपत्य में लेने के बावजूद 1946 में ब्रिटेन भारत को छोड़ने का फैसला लेता है। नौसेना की बगावत के दौरान कराची-बम्बई से लेकर विशाखापत्तनम-कलकत्ता तक के बन्दरगाहों पर खड़े जलजहाजों को आग के हवाले कर दिया गया था। ...अगर दुबारा ऐसी स्थिति पैदा होती है, तो शायद अँग्रेज भारत से बाहर ही न निकल पायें!
       भारत को सदा के लिए शारीरिक-मानसिक रुप से अपाहिज बनाने के निर्देश के साथ माउंटबेटन को फरवरी 1947 में भारत का अन्तिम वायसराय बनाकर भेजा जाता है- सत्ता-हस्तांतरण के लिए। योजना है- जून'1948 तक सत्ता-हस्तान्तरण सम्पन्न करने की, मगर साथ ही, माउंटबेटन को छूट दी गयी है (प्रधानमंत्री एटली की ओर से) कि परिस्थितियों के अनुसार वे कोई भी निर्णय ले सकते हैं 
        माउंटबेटन के चयन के पीछे सिर्फ यही एक कारण नहीं है कि वे विश्वयुद्ध के दिनों में एशिया-प्रशान्त क्षेत्र के कमाण्डिंग-जेनरल रह चुके हैं। एक और कारण है- लेडी एडविना का चरित्र! उनके चरित्र को अच्छा नहीं कहा जा सकता, वे कॉलेज के दिनों में नेहरूजी की मित्र रह चुकी थीं, नेहरूजी अभी "विधुर" हैं और भारत को "अपाहिज" बनाने के लिए नेहरूजी का कमजोर पड़ना जरूरी है- ये सारी बातें एटली जानते थे! ध्यान रहे- 1946 में ही नेहरूजी को काँग्रेस का अध्यक्ष बनाया जा चुका है- यानि तय है कि स्वतंत्र भारत का प्रधानमंत्री उन्हीं को बनना है
        एक प्रेस-कॉन्फ्रेन्स में माउंटबेटन से पत्रकार पूछते हैं- कब स्वतंत्र हो रहा है भारत?
       माउंटबेटन को 15 अगस्त की तारीख सही जान पड़ती है। वे कहते हैं- 15 अगस्त 1947 को। यह तारीख इसलिए उन्हें सही लगी कि अभी कुछ अरसा पहले इसी दिन विश्वयुद्ध का समापन हुआ था। उस जमाने में अँग्रेजों को सबसे बड़ा कूटनीतिज्ञ माना जाता था। तो माउंटबेटन द्वारा इस तारीख के चयन के पीछे एक और मंशा भी थी। चूँकि इस दिन जापान ने आत्मसमर्पण किया था, इसलिए जाहिर है कि यह तारीख हर साल जापानियों के मन में टीस पैदा करेगी। इस प्रकार, 15 अगस्त के दिन जश्न मनाते भारतीयों तथा इसी दिन शोक मनाते जापानियों के बीच भविष्य में गहरी मित्रता कायम नहीं हो पायेगी, जिसका बीजारोपण नेताजी सुभाष करके गये हैं- उस समय की परिस्थितियों के हिसाब से माउंटबेटन ने ऐसा ही सोचा होगा!
***
खैर, तो माउंटबेटन भारत की आजादी या सत्ता-हस्तांतरण की तारीख एक पत्रकार-वार्ता में अचानक निर्धारित कर देते हैं- 15 अगस्त 1947! भारतीय या काँग्रेसी नेता अपना कोई पक्ष नहीं रख पाते- या उनकी कुछ नहीं चलती। कायदे से, भारत में भादों के महीने में, कृष्णपक्ष में, मध्यरात्रि की बेला में कोई शुभ काम होना ही नहीं चाहिए था! मगर शायद उस समय के भारतीय राजनेता सत्ता पाने की जल्दी में थे।
इसी दिन भारत स्वतंत्र होता है, या यूँ कहा जाय कि इसी दिन बाकायदे सत्ता-हस्तांतरण होता है। साथ ही, देश का बँटवारा होता है। दंगे होते हैं। लाखों की संख्या में लोग मारे जाते हैं। साढ़े तीन सौ रियासतों को छूट दे दी जाती है कि वे चाहें तो स्वतंत्र रहें, चाहें तो भारत या पाकिस्तान किसी के भी साथ मिल जायें! हैदराबाद पाकिस्तान से मिलना चाहता है, तो त्रावणकोर स्वतंत्र रहना चाहता है! पाकिस्तान काश्मीर पर कब्जा चाहता है। स्थितियाँ जटिल हो जाती हैं। माउंटबेटन से अनुरोध किया जाता है कि वे ही सालभर सत्ता सम्भालें। वे ही स्वतंत्र भारत के पहले गवर्नर जनरल बनते हैं- इस शर्त के साथ कि बाहर फैसला नेहरूजी का दीखेगा, मगर अन्दरखाने फैसला उन्हीं का होगा! सम्भवतः इसी शर्त के कारण काश्मीर का मामला यूएनओ में जाकर लटकता है!
आगे चलकर अँग्रेजों द्वारा दुनिया को अपनी शानो-शौकत दिखलाने की नीयत से बनवाया गया 300 एकड़ में फैला 300 कमरों वाला वायसराय हाउस हमारा राष्ट्रपति भवन बनता है; उनका संसद भवन ही हमारा संसद भवन बनता है, जिसकी बनावट "शून्य" के आकार में है, जो भारतीय वास्तुशास्त्र के हिसाब से शुभ नहीं है; उनका 1935 का अधिनियम ही हमारे संविधान का मुख्य भाग- करीब दो तिहाई- 70 प्रतिशत- बनता है; उनकी न्याय प्रणाली, उनकी नौकरशाही, उनकी पुलिस व्यवस्था ही कायम रहती है, जिन्हें कि दुनिया के सबसे बड़े उपनिवेश पर राज करने की नीयत से बनाया गया था। इनके अलावे, भारत ब्रिटिश साम्राज्य के गुलाम देशों के संगठन का भी सदस्य बना रह जाता है- आज तक!
***
21 अक्तूबर 1943 को सिंगापुर में नेताजी सुभाष द्वारा "स्वतंत्र भारत की अन्तरिम सरकार" की स्थापना की घटना को हमारे इतिहास के पन्नों से गायब कर दिया जाता है, जबकि इस भारत सरकार की अपनी राष्ट्रीय सेना, अपनी न्यायपालिका, अपना बैंक, अपनी मुद्रा, अपना डाकघर, अपने डाक-टिकट, अपना संविधान, राष्ट्रगीत, राष्ट्रध्वज, राष्ट्रभाषा सबकुछ होता है! भारत से ब्रिटिश साम्राज्य के खात्मे के लिए, देश को आजाद कराने के लिए यह सरकार बाकायदे युद्ध करती है। यह सरकार सिंगापुर से रंगून तो स्थानान्तरित होती है, मगर कुछ कारणों से दिल्ली में स्थापित नहीं हो पाती।
यह सब कुछ नयी पीढ़ी को नहीं बताया जाता। भला कौन सरकार चाहेगी कि उसकी नयी पीढ़ी नेताजी सुभाष के चरित्र से प्रभावित हो, जिसने एक स्थापित साम्राज्य के खिलाफ न केवल बगावत की थी, बल्कि बाकायदे जंग किया था! भले यह जंग आजादी के लिए थी, मगर सरकारों की नजर में बगावत आखिर बगावत ही होती है! नहीं तो क्या कारण है कि आजादी के लिए जंग करने वाले आजाद हिन्द सैनिकों को ही फिर से आजाद भारत की सेना में शामिल नहीं किया जाता? देखा जाय, तो यही सरकार "स्वतंत्र भारत" की सरकार थी... इसकी व्यवस्था ही स्वतंत्र भारत की व्यवस्था थी!   
आज जो सरकारें देश में बनती हैं, या आज जो व्यवस्था देश में कायम है, वह ब्रिटिश साम्राज्य की है! यकीन न हो, तो एकबार सोच कर देखिये कि हम आखिर पाकिस्तान में या ब्रिटेन का गुलाम रह चुके किसी भी देश में अपना "राजदूत" क्यों नहीं भेजते? या फिर, जिसे भेजते हैं, उसे उच्चायुक्त के स्थान पर राजदूत कहने से डरते क्यों हैं?? आखिर किसका डर है हमें???  
***
एक जिम्मेदार एवं जागरुक नागरिक होने के नाते हमारा फर्ज बनता है कि हम अपने राष्ट्रीय प्रतीकों के प्रति सम्मान व्यक्त करें, देश में कायम व्यवस्था के प्रति विश्वास व्यक्त करें, राष्ट्रीय त्यौहारों को मनायें और 15 अगस्त एवं 26 जनवरी को तिरंगा जरूर लहरायें।
ऊपर जो इतना सब कुछ कहा गया है, उसका उद्देश्य बागी बनना या बनाना नहीं है, बल्कि सिर्फ इतना है कि हमें "सत्य" तथा "तथ्यों" की जानकारी रहनी चाहिए... 

इति, जय हिन्द! 

शनिवार, 9 अगस्त 2014

180. माँ, सन्तान तथा जोंक: एक काल्पनिक तस्वीर


       एक तस्वीर अक्सर जेहन में उभरती है
       एक काल्पनिक चित्र!
       एक स्त्री है, जिसे प्रकृति से चिरयौवन का वरदान प्राप्त है। हजारों वर्षों तक वह मुस्कुराती रही- रेशमी कपड़ों में लिपटी, सोने-चाँदी के आभूषणों से लदी...
       पिछली कुछ शताब्दियों से उसकी दुर्दशा का दौर चल रहा है। ...और अभी पिछले कुछ दशकों से तो वह बेचारी सिसक रही है... रुखे बाल, शरीर पर चिथड़े... और सबसे भयानक बात- उसके शरीर पर सैकड़ों जोंक! मोटे-मोटे जोंक, जो हर वक्त उस स्त्री का खून चूसते रहते हैं... बालों के हजारों जूँओं तथा हाथ-पैरों पर लाखों चीलरों को तो खैर, जाने दीजिये- ये दीखते तो नहीं हैं, हालाँकि खून ये भी चूस रहे हैं। मगर जोंक जो हैं, वे बड़ी मात्रा में उस स्त्री का खून चूस रहे हैं... और उस स्त्री के सन्तानों को यह साफ-साफ दिखाई दे रहा है...
       ...मगर अफसोस! कि उसकी सन्तान उन जोंको को अपनी माँ के शरीर से हटाना ही नहीं चाहते! उल्टे वे जहाँ-तहाँ से अपनी माँ के ही शरीर के कपड़ों को फाड़ देते हैं, ताकि जोंको को खून चूसने के लिए नये-नये स्थान मिलते रहें...
       समझ में नहीं आता, उसकी सन्तानों की बुद्धि कब खुलेगी? आखिर कब वे नमक छिड़केंगे जोंको पर? एक मामूली उपाय जोंको को मारने का, उनसे छुटकारा पाने का...
...जब उनकी माँ मरणासन्न हो जायेगी- तब बुद्धि खुलेगी उसकी सन्तानों की?
       (साथियों, क्या बताना पड़ेगा कि वह स्त्री कौन है और उसकी सन्तान कौन है?)


रविवार, 3 अगस्त 2014

179. हाइब्रिड बनाम जी.एम. फसलें


       मुझे लगा कि आनुवांशिक इंजीनियरिंग का अ भी बिना जाने, कृषि विज्ञान का क भी बिना जाने या खेतों में काम बिना किये भी- एक आम आदमी के लिहाज से- मैं इस विषय पर अपने विचार प्रकट कर सकता हूँ
       पहले एक पुरानी कहानी।
वर्षों पहले ब्रिटेन में हजारों गायों को मारना पड़ा था, क्योंकि उनके दिमाग में एक संक्रामक बीमारी ने जन्म ले लिया था। ये गायें दूध दुहने के लिए नहीं थीं, इनका इस्तेमाल गोमांस के लिए होता था। तब (हमारे यहाँ की) एक पत्रिका में लेख छपा था, जिसका शीर्षक कुछ यूँ था- क्यों पगलाई गायें? उसमें बताया गया था कि गायों के कत्लखाने में गोमांस के छोटे-छोटे टुकड़े बचते थे, उन्हें चारे में मिलाकर गायों को खिलाया जाने लगा। अब मांस तो सीधा प्रोटीन है। इससे गायें बहुत जल्दी मोटी-ताजी होने लगीं और इस व्यवसाय में लगे लोगों को काफी मुनाफा होने लगा। मगर बाद में ये गायें पागल होने लगीं। मनुष्यों तक यह बीमारी न फैले, इसलिए बड़ी संख्या में ऐसी गायों को मार डाला गया।
       इस घटना से साबित होता है कि प्रकृति के जो मूलभूत नियम होते हैं, उनमें हमें छेड़-छाड़ नहीं करनी चाहिए। शुरु में फायदा हो सकता है, मगर अन्तिम रुप से हमें नुक्सान ही उठाना पड़ेगा। गाय को प्रकृति ने शाकाहारी बनाया है, तो उसे शाकाहारी ही रहने दिया जाय- उसे तुरन्त प्रोटीन देने के चक्कर में मांस न खिलाया जाय।
       ***
       अब बात विषय की।
       हाइब्रिड फसलें: फसलों का हाइब्रिड यानि संकर होना उतना ही सहज और स्वाभाविक है, जितना कि मनुष्यों में विवाह की परम्परा का होना। स्त्री युवा होती है एक घर में, मगर उसका विवाह किया जाता है दूसरे घर के युवा के साथ। आम तौर पर यह दूसरा घर या दूसरा युवा "दूर का" होता है, न कि नजदीक का। उम्मीद की जाती है कि इससे अगली पीढ़ी बेहतर होगी और उसमें कुछ नये गुण आयेंगे। फसलों के साथ भी यही बात है। धान की एक नस्ल का दूसरे नस्ल से संयोग कराके एक तीसरे बेहतर नस्ल की उम्मीद की जाती है। धान के तो बीजड़ों को भी एक खेत से उखाड़ कर दूसरे खेत में रोपा जाता है।
जैसे स्त्री का विवाह पुरुष से ही होता है किसी और प्राणी से नहीं, वैसे संकर फसल बनाने के लिए गेहूँ का संयोग गेहूँ से, धान का संयोग धान से, आम का संयोग आम से ही कराया जाता है। यह एक स्वाभाविक प्रक्रिया है और पुराने समय से चली आ रही है।
       जी.एम. फसलें: जी.एम. फसलें "अस्वाभाविक", "अप्राकृतिक" होती हैं। उदाहरण के लिए- एक विशेषज्ञ (टीवी पर) बता रहे थे कि गेहूँ के जीन में महिला का जीन मिलाकर गेहूँ की एक किस्म विकसित की गयी है, जिसके बारे में दावा किया जा रहा है कि यह "डायरिया-प्रतिरोधक" है! ...तो इसी प्रकार, अप्राकृतिक तरीके से जी.एम. फसलें तैयार की जाती हैं।  
       शुरु में इनसे मुनाफा कमाया भी जा सकता है, जैसा कि ब्रिटेन में गायों को मांसाहारी बनाकर मुनाफा कमाया गया; मगर बाद में इनके क्या दुष्परिणाम होंगे- इसका अनुमान हम अभी नहीं लगा सकते।
       ***
       दूसरी बात।
इस दुनिया में जितनी आबादी है, उसकी जरुरत से ज्यादा अनाज पैदा होता है। वितरण में समानता न होने के दुनिया में भूखमरी तथा कुपोषण है। वितरण व्यवस्था ठीक करने की जरुरत है।
       जी.एम. फसलें तैयार कर कुछ कम्पनियाँ मोटा मुनाफा कमाना चाहती हैं, क्योंकि इनके बीज हम रख नहीं सकते- हम पर मुकदमा ठोंक दिया जायेगा और हो सकता है कि इनके बीज काम ही न आयें। हर बार उन्हीं से बीज खरीदना हमारी बाध्यता होगी।
       भारत चूँकि ऋण चक्र में फँसा हुआ देश है, इसलिए इसने विश्व व्यापार संगठन के समझौतों पर दस्तखत कर रखे हैं और थोड़ी-बहुत ना-नुकुर के बाद आज नहीं तो कल, इसे इस संगठन की हर एक शर्तों को मानना ही होगा!
       ***