रविवार, 3 अगस्त 2014

179. हाइब्रिड बनाम जी.एम. फसलें


       मुझे लगा कि आनुवांशिक इंजीनियरिंग का अ भी बिना जाने, कृषि विज्ञान का क भी बिना जाने या खेतों में काम बिना किये भी- एक आम आदमी के लिहाज से- मैं इस विषय पर अपने विचार प्रकट कर सकता हूँ।
       पहले एक पुरानी कहानी।
वर्षों पहले ब्रिटेन में हजारों गायों को मारना पड़ा था, क्योंकि उनके दिमाग में एक संक्रामक बीमारी ने जन्म ले लिया था। ये गायें दूध दुहने के लिए नहीं थीं, इनका इस्तेमाल गोमांस के लिए होता था। तब (हमारे यहाँ की) एक पत्रिका में लेख छपा था, जिसका शीर्षक कुछ यूँ था- क्यों पगलाई गायें? उसमें बताया गया था कि गायों के कत्लखाने में गोमांस के छोटे-छोटे टुकड़े बचते थे, उन्हें चारे में मिलाकर गायों को खिलाया जाने लगा। अब मांस तो सीधा प्रोटीन है। इससे गायें बहुत जल्दी मोटी-ताजी होने लगीं और इस व्यवसाय में लगे लोगों को काफी मुनाफा होने लगा। मगर बाद में ये गायें पागल होने लगीं। मनुष्यों तक यह बीमारी न फैले, इसलिए बड़ी संख्या में ऐसी गायों को मार डाला गया।
       इस घटना से साबित होता है कि प्रकृति के जो मूलभूत नियम होते हैं, उनमें हमें छेड़-छाड़ नहीं करनी चाहिए। शुरु में फायदा हो सकता है, मगर अन्तिम रुप से हमें नुक्सान ही उठाना पड़ेगा। गाय को प्रकृति ने शाकाहारी बनाया है, तो उसे शाकाहारी ही रहने दिया जाय- उसे तुरन्त प्रोटीन देने के चक्कर में मांस न खिलाया जाय।
       ***
       अब बात विषय की।
       हाइब्रिड फसलें: फसलों का हाइब्रिड यानि संकर होना उतना ही सहज और स्वाभाविक है, जितना कि मनुष्यों में विवाह की परम्परा का होना। स्त्री युवा होती है एक घर में, मगर उसका विवाह किया जाता है दूसरे घर के युवा के साथ। आम तौर पर यह दूसरा घर या दूसरा युवा "दूर का" होता है, न कि नजदीक का। उम्मीद की जाती है कि इससे अगली पीढ़ी बेहतर होगी और उसमें कुछ नये गुण आयेंगे। फसलों के साथ भी यही बात है। धान की एक नस्ल का दूसरे नस्ल से संयोग कराके एक तीसरे बेहतर नस्ल की उम्मीद की जाती है। धान के तो बीजड़ों को भी एक खेत से उखाड़ कर दूसरे खेत में रोपा जाता है।
जैसे स्त्री का विवाह पुरुष से ही होता है किसी और प्राणी से नहीं, वैसे संकर फसल बनाने के लिए गेहूँ का संयोग गेहूँ से, धान का संयोग धान से, आम का संयोग आम से ही कराया जाता है। यह एक स्वाभाविक प्रक्रिया है और पुराने समय से चली आ रही है।
       जी.एम. फसलें: जी.एम. फसलें "अस्वाभाविक", "अप्राकृतिक" होती हैं। उदाहरण के लिए- एक विशेषज्ञ (टीवी पर) बता रहे थे कि गेहूँ के जीन में महिला का जीन मिलाकर गेहूँ की एक किस्म विकसित की गयी है, जिसके बारे में दावा किया जा रहा है कि यह "डायरिया-प्रतिरोधक" है! ...तो इसी प्रकार, अप्राकृतिक तरीके से जी.एम. फसलें तैयार की जाती हैं।  
       शुरु में इनसे मुनाफा कमाया भी जा सकता है, जैसा कि ब्रिटेन में गायों को मांसाहारी बनाकर मुनाफा कमाया गया; मगर बाद में इनके क्या दुष्परिणाम होंगे- इसका अनुमान हम अभी नहीं लगा सकते।
       ***
       दूसरी बात।
इस दुनिया में जितनी आबादी है, उसकी जरुरत से ज्यादा अनाज पैदा होता है। वितरण में समानता न होने के दुनिया में भूखमरी तथा कुपोषण है। वितरण व्यवस्था ठीक करने की जरुरत है।
       जी.एम. फसलें तैयार कर कुछ कम्पनियाँ मोटा मुनाफा कमाना चाहती हैं, क्योंकि इनके बीज हम रख नहीं सकते- हम पर मुकदमा ठोंक दिया जायेगा और हो सकता है कि इनके बीज काम ही न आयें। हर बार उन्हीं से बीज खरीदना हमारी बाध्यता होगी।
       भारत चूँकि ऋण चक्र में फँसा हुआ देश है, इसलिए इसने विश्व व्यापार संगठन के समझौतों पर दस्तखत कर रखे हैं और थोड़ी-बहुत ना-नुकुर के बाद आज नहीं तो कल, इसे इस संगठन की हर एक शर्तों को मानना ही होगा!
       ***
       

गुरुवार, 31 जुलाई 2014

178. "सी-सैट" (के बहाने)


जैसा कि मुझे (थोड़ा-बहुत भी) जानने वाले जानते ही होंगे, मैं "सुधारों" में नहीं, बल्कि "आमूल परिवर्तन" में विश्वास करता हूँ। मेरा समय अभी आया नहीं है, मुझसे लोग अभी सहमत भी नहीं हो रहे हैं। (इसलिए मैंने कुछ समय से राजनीतिक टीका-टिप्पणी छोड़ भी रखी है।)
फिर भी, जब "सी-सैट" (सिविल सर्विसेज एप्टीच्यूड टेस्ट) के मुद्दे पर "सुधार" की बात हमारी सरकार कर ही रही है, तो सोचा इस मामले में अपना विचार बता दूँ।
दरअसल हमारा देश "अधिकारियों" के चयन के मामले में आज तक "ब्रिटिश हैंग-ओवर" से उबर नहीं पाया है।
मेरे हिसाब से, देश के प्रशासनिक अधिकारियों के रुप में उन्हीं युवाओं का चयन होना चाहिए, जो स्नातक (चाहे प्राप्तांक कितना भी हो) तो हों ही, साथ ही-
1. जिन्होंने "सामाजिक" कार्य किये हों। इसके लिए सरकार को चाहिए कि वह बेसहारों के लिए आश्रम बनाये और यहाँ "स्वयंसेवक" के रुप में एक या दो साल सेवा करने वालों को ही आई.ए.एस. की परीक्षा में बैठने की अनुमति दे;
2. जिन्होंने "सांस्कृतिक" गतिविधियों में सक्रिय हिस्सा लिया हो। इसके लिए सरकार हर साल बसन्त एवं शरत काल में हफ्तेभर का "भारतीय सभ्यता-संस्कृति उत्सव" का आयोजन करवा सकती है। इसमें सक्रिय हिस्सेदारी करने वाले युवा ही आई.ए.एस. की परीक्षा में बैठे।
3. जिन्होंने "साहसिक" अभियानों में हिस्सा लिया हो। इसके लिए सरकार प्रतिवर्ष "भारत भ्रमण साइकिल यात्रा" का आयोजन करवा सकती है। यह यात्रा "हाइ-वे" के बजाय मामूली सड़कों के माध्यसे से होनी चाहिए। शायद साल भर में यह यात्रा पूरी हो सकती है। इसमें सफल रहने वालों को ही आई.ए.एस. की परीक्षा में बैठने दिया जाय।
4. परीक्षा बहुत ही साधारण होनी चाहिए, जिससे की "कोचिंग इंस्टीच्यूटों" की जरुरत समाप्त हो जाय। परीक्षा का माध्यम वे सभी भारतीय भाषायें होनी चाहिए, जिनकी अपनी सुगठित लिपियाँ हों। अँग्रेजी का एक पत्र हो- क्योंकि यह एक प्रमुख अन्तर्राष्ट्रीय भाषा है तथा इसका साहित्य उत्कृष्ट है- यह परीक्षा का माध्यम नहीं होना चाहिए।
5. जिस किसी युवा ने किसी भी क्षेत्र या विधा में देश का नाम दुनियाभर में रौशन किया है, या जिसने "ओलिम्पिक" खेलों में भाग लिया है, उसका सीधा चयन हो- प्रशासनिक अधिकारी के रुप में।
***
आज हमारे प्रशासनिक अधिकारियों पर "संवेदनाशून्य" का आरोप लगता है। मुझे लगता है, यह सच भी है। आज आई.ए.एस बनने के लिए युवा 18-20 घण्टे बन्द कमरे में पढ़ाई करते हैं। दोस्त-यार-समाज तो दूर, परिजनों से भी कटे रहकर!

ऐसे युवकों में "आई.क्यू." का स्तर तो ऊँचा होता है, मगर उनमें "ई.क्यू." (इमोशनल क्वोशेण्ट) का स्तर बहुत ही नीचा होता है- शून्य के करीब। इनसे हम "मानवीय संवेदना" की उम्मीद भी कैसे रख सकते हैं???

रविवार, 13 जुलाई 2014

177. रेल को रेल ही रहने दो


       रेल को रेल ही रहने दिया जाय- इसे हवाई जहाज न ही बनाया जाय, तो बेहतर। जिन्हें कहीं पहुँचने की बहुत जल्दी हो, वे हवाई जहाज पकड़ लें और जिन्होंने बुलेट ट्रेन में बैठने की कसम खा ली है, वे चीन या जापान की नागरिकता ले लें!
       हम तो इतना ही चाहेंगे कि हमारी रेलगाड़ी- पैसेन्जर तथा एक्सप्रेस दोनों- ज्यादा लेट न हो, किराया भी ज्यादा न हो, सुरक्षा एवं संरक्षा थोड़ी चाक-चौबन्द हो, बस और क्या? स्टेशन के बाथरूम वगैरह साफ-सुथरे हों- ये 'पे एण्ड यूज' वाली व्यवस्था अटपटी लगती है।
       मान लीजिये, बुलेट ट्रेनों का जमाना आ ही गया, तो क्या होगा? सहयात्रियों से बातचीत नहीं के बराबर होगी, मूँगफली वाले या दूसरे हॉकर नहीं होंगे, खिड़की से हाथ निकाल कर किसी स्टेशन पर कुछ खरीद नहीं सकेंगे... और सबसे बड़ी बात ऐसी फिल्में नहीं बन पायेंगी, जिसमें कोई शाहरुख खान प्लेटफार्म से खिसकती ट्रेन के दरवाजे से हाथ बढ़ाकर किसी काजोल या दीपिका को ट्रेन में चढ़ा सके! तो यह एक नीरस रेल होगी। है कि नहीं? हम भी जापानियों के तरह ट्रेन में बैठते ही पुस्तक/पत्रिका या डिक्शनरी निकाल कर बैठ जायेंगे। वैसे, यह पुरानी बात है- आज के दौर में वे लैपटॉप लेकर बैठते होंगे। यही हम भी किया करेंगे। यात्रा का कोई आनन्द ही नहीं रह जायेगा।
       मैं एक पैसेन्जर ट्रेन की एक बोगी के अन्दर का फोटो पेश कर रहा हूँ। इसमें एक महिला एक बकरी को पीपल के पत्ते खिला रही है। फोटो में पता नहीं चल रहा है- आगे बाथरुम के पास साइकिल भी रखी थी। वैसे, कायदे से, साइकिल को पैडल के सहारे खिड़की के सरिया से लटकाना चाहिए था। आप कुछ भी कहें, मुझे तो ऐसे ही सफर में आनन्द आता है!
       स्टेशन अगर हवाई अड्डे-जैसे बन गये, तो न बेघर वहाँ रात बिता पायेंगे और न ही बुजुर्ग प्लेटफार्म के किसी किनारे की बेंचों पर शाम बिता पायेंगे।
       इसलिए हम तो यही कहेंगे भाई, कि रेल को रेल ही रहने दो, रेलवे स्टेशन को स्टेशन ही रहने दो, इन्हें हवाई जहाज और हवाई अड्डा न बनाओ...  

शुक्रवार, 11 जुलाई 2014

176. 'कोलोजियम'


       ठीक-ठीक 'कोलोजियम' का अर्थ मैं नहीं जानता, मगर इतना समझता हूँ कि यह एक रहस्यमयी किस्म की संस्था है, जो गोपनीय तरीके से सर्वोच्च न्यायालय तथा उच्च न्यायालयों के लिए मुख्य न्यायाधीशों की नियुक्ति करती है।
       मैं यह सुझाव पेश करता हूँ कि हमारे देश में चुनावों पर होने वाला अन्धाधुन्ध खर्च बन्द हो और उसके स्थान पर सारे राजनीतिक दल मिलकर एक रहस्यमयी 'कोलोजियम' की स्थापना कर लें। यह संस्था ही तय करे कि कौन कितने दिनों के लिए प्रधानमंत्री/मुख्यमंत्री/मंत्री वगैरह बनेगा।
विधायकों/सांसदों की जरुरत ही क्या रह गयी है, वे तो तो खरीदे-बेचे जाते हैं! (सुना है कि एक एम.एल.सी. का बाजार भाव अभी 40 करोड़ चल रहा है!)
       चुनावों की जरुरत तब होती है, जब अलग-अलग राजनीतिक दलों की "विचारधारायें" अलग-अलग हों। यहाँ तो क्या वामपन्थी, क्या दक्षिणपन्थी, क्या मध्यमार्गी, क्या समाजवादी, क्या राष्ट्रवादी, क्या हिन्दूवादी, क्या मुस्लिमवादी... सबकी विचारधारा एक समान हो गयी है- बाजारीकरण, उदारीकरण, निजीकरण, वैश्वीकरण, वगैरह-वगैरह। हर नेता इस देश को चीन, जापान, कोरिया, फ्रान्स, जर्मनी, स्वीजरलैण्ड, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया बनाने पर तुला हुआ है। वह भी विदेशी, आवारा पूँजी तथा विदेशी तकनीक के बल पर। ऐसे में "कोउ  नृप भये, हमें का हानि?"
       है कोई माई का लाल राजनेता, जो सीना ठोंककर यह आह्वान कर सके कि हम विश्व बैंक, अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष या किसी अमीर राष्ट्र से ऋण नहीं लेंगे; हम विश्व व्यापार संगठन की शर्तों को मानने से इन्कार करते हैं; हम अमेरिका या किसी भी अमीर राष्ट्र की चौखट पर नाक नहीं रगड़ेंगे; हम भारतीय प्रतिभा- जो कि दुनियाभर में फैली हुई है- के बल पर तथा भारतीय संसाधनों- जो प्रकृति ने दोनों हाथों से हमें दिया है- के बल पर इस देश को फिर से महान बनायेंगे, चाहे इसके लिए हममें से हरेक भारतीय को आधा पेट खाकर ही क्यों न सोना पड़े! कोई नहीं है न ऐसा...
       ...फिर, क्या फर्क पड़ता है कि एक वामपन्थी हमारा प्रधानमंत्री बने, या दक्षिणपन्थी, या मध्यमार्गी? बेकार ही चुनाव में इतना भारी-भरकम खर्च किया जाता है। इस पैसे का उपयोग बेचारे गरीब राजनेता अपना वेतन-भत्ता आदि बढ़ाने में कर सकते हैं!
       सोच कर देखियेगा।
       एक और बात है। हम भारतीय पब्लिक कभी बगावत तो कर नहीं सकते। इस औपनिवेशिक व्यवस्था के सलीब को हम पीढ़ी-दर-पीढ़ी ढोते रहेंगे- चाहे देश रसातल में चला जाय। उसी प्रकार, हमारी सेना भी कभी बगावत नहीं कर सकती। "पे कमीशन" के साथ उनके वेतन-भत्ते बढ़ ही रहे हैं, देश की क्या चिन्ता?

       ऐसे में, "कोलोजियम" व्यवस्था ही ठीक रहेगी।     

रविवार, 15 जून 2014

175. 'मोदी सरकार' या 'यूपीए-3'?


       1. मुझे उम्मीद थी यह सरकार भारतीय विश्वविद्यालयों का सोया हुआ स्वाभिमान जगायेगी और उन्हें विश्वस्तरीय बनायेगी, मगर ऐसा न करके पिछली सरकार ने जो योजना बनायी थी भारत में विदेशी विश्वविद्यालयों की शाखायें खोलने की, उसी योजना को यह सरकार आगे बढ़ाने जा रही है।
       2. परमाणु करार की आड़ में मनमोहन सिंह जी ने अमेरिका से गुपचुप तरीके से बड़े पैमाने पर हथियार खरीदने का समझौता किया था (बिना वैश्विक निविदा के! उनके हथियार हमारी सेनाओं की जरुरतों के अनुरुप भी नहीं हैं), अब मोदी जी अमेरिका यात्रा का सिर्फ यही एक मकसद हो सकता है कि यह गोपनीय समझौता जारी रहेगा!
       3. मैंने सोचा था रक्षा-प्रतिरक्षा मे क्षेत्र में यह सरकार देश को स्वावलम्बी बनायेगी, मगर हो रहा है बिल्कुल उल्टा- इस क्षेत्र में एफडीआई को शत-प्रतिशत करके!
       4. लग्जरी गाड़ियों में डीजल का इस्तेमाल नहीं होना चाहिए। डीजल है ट्रक, बस, ट्रैक्टर, रेल इंजन, जेनरेटर, पम्प सेट-जैसी मशीनों के लिए। मगर यह सरकार पिछली सरकार की ही नीति को आगे बढ़ा रही है डीजल को बाजार के हवाले करके- सब जानते हैं इससे माल के ढुलाई, खेती-बाड़ी सब महँगी होगी, जो महँगाई को और बढ़ायेगी।
       5. वढेरा का वीवीआईपी दर्जा कायम रहना या प्रियंका को सरकारी बँगले का अवैध आबण्टन जारी रहना अजीब लगता है... । लगता नहीं है कि वढेरा के खिलाफ कोई जाँच-वाच नहीं होने वाली है।
       6. जब अम्बानी के गैस की कीमत दोगुनी करने की बारी आई, तो "कार्रवाई" और जब जनता को महँगाई से तत्काल राहत दिलाने की बारी आई, तो "सब्जबाग", वह भी 100 दिनों बाद, तो 60 महीनों बाद के... यहाँ तक कि 2022 तक के...?
       7. सब जानते हैं कि प्रवाह न होने के कारण गंगा न केवल प्रदूषित हो रही है, बल्कि मर रही है; ऐसे में उत्तराखण्ड में (गंगा तथा सहायक नदियों पर) प्रस्तावित 90 के करीब बाँधों की परियोजनाओं को न केवल अविलम्ब रद्द करने की जरुरत है, बल्कि (टिहरी से लेकर फरक्का तक) बन चुके बन चुके बाँधों को तोड़ने की जरुरत है; मगर इस सरकार ने सरदार सरोवर बाँध की ऊँचाई बढ़ाने का फैसला लेकर साबित कर दिया है कि यह बड़े बाँधों की पक्षधर है। गंगा में थूकने पर जुर्माना लगाने की बात करके लोगों को मूर्ख बनाया जा रहा है!
       8. लीजिये, एक और खबर कि विदेशी काला धन वालों के नामों की सूची जारी करने से इस सरकार ने भी मना कर दिया है। (जहाँ तक एसाअईटी गठन की बात है, यह सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के कारण एक बाध्यता थी।) देशी काला धन वालों पर नकेल कसने का एक मामूली उपाय यह है कि लॉकरों की गोपनीयता समाप्त की जाय, मगर लगता नहीं है कि ऐसा होगा।

       हमें सोचना पड़ेगा- यह "मोदी सरकार" ही है... या "संप्रग-3" सरकार???   

गुरुवार, 5 जून 2014

174. उम्मीदों के ताबूत की दस कीलें!


       सच कहूँ, तो नरेन्द्र मोदी जी के नाम पर भाजपा को इस चुनाव में ऐसा तगड़ा बहुमत मिलेगा- ऐसी उम्मीद मुझे नहीं थी। दूसरी तरफ, जहाँ तक मैंने जाना है, व्यक्तिगत रुप से मोदी जी बहुत ही चरित्रवान व्यक्ति हैं। थ्योरी कहती है, एक चरित्रवान व्यक्ति को अगर पूर्ण बहुमत मिल जाय 5 वर्षों तक शासन करने का, तो वह व्यक्ति चाहे, तो देश की तकदीर बदल सकता है!
       बस यहीं से मेरे मन में अन्तर्द्वन्द शुरु हो गया था। क्या मोदी जी ही वह राष्ट्रनायक हैं, जिनके नेतृत्व में भारत का पुनरुत्थान होना है? अगर ऐसा ही है, तो साल भर से मेरी अन्तरात्मा मुझे गलत सन्देश क्यों दे रही थी?
       मगर जल्दी ही मुझे अपनी उम्मीदों को ताबूत में डालने के लिए मजबूर होना पड़ा। यह काम क्रम से हुआ-
पहली कील- सुभाष को भारतरत्न। शपथग्रहण से ऐन पहले खबर फैलाई गयी कि मोदी जी अपनी सरकार की तरफ से जो पहला काम करेंगे, वह है नेताजी सुभाष को भारतरत्न देना। मुझे आश्चर्य हुआ कि नरेन्द्र मोदी-जैसा गम्भीर राजनेता भला ऐसा शिगूफा कैसे छुड़वा सकता है अपनी सोशल मीडिया की टीम के माध्यम से? नेताजी सुभाष को 1992 में भारतरत्न दिया जा चुका है और देकर वापस लिया जा चुका है। बिना उनकी मृत्यु के रहस्य से पर्दा उठाये दुबारा ऐसी कोशिश को मूर्खता ही कहा जायेगा। मुझे अब तक समझ में नहीं आया कि इस शिगूफे के पीछे वास्तविक कारण क्या था? अगर अटल जी को देना है, तो ऐसे ही दे दीजिये- कौन रोकेगा?
दूसरी कील- पाकिस्तान प्रेम। सार्क के सभी देशों से मेहमान आये थे शपथग्रहण में, मगर पाकिस्तान को ज्यादा तवज्जो देना मुझे ठीक नहीं लगा।
तीसरी कील- 100 दिनों की मोहलत। शपथग्रहण के तुरन्त बाद मोदी जी ने जनता से 100 दिनों की मोहलत माँग ली! क्यों? महँगाई कम करने के लिए कई आयोगों ने सुझाव दे रखे हैं। एक आयोग के मुखिया आप स्वयं थे। सीधे उन सिफारिशों को अमल में लाने के बजाय 100 दिनों की मोहलत। यह तो अच्छी बात नहीं हुई। आपने जो 10 सूत्री एजेण्डा पेश किया, उसमें से भी महँगाई गायब!
चौथी कील- धारा 370। सरकार के गठन के बाद जनता उम्मीद करेगी कि सरकार महँगाई कम करने तथा भ्रष्टाचार पर नियंत्रण के लिए ठोस कदम उठाये। मगर जनता अभी मुँह खोलती कि उसके पहले ही धारा 370 का भावनात्मक मुद्दा उठा दिया गया। यह भी मुझे ठीक नहीं लगा।
पाँचवी कील- रॉबर्ट वढेरा का वीवीआईपी रुतबा। वढेरा का यह रुतबा देश के माथे पर कलंक है। जिन देशों में सी या डी ग्रेड की राजनीति चलती है, वहाँ की बात अलग है। मगर किसी सभ्य देश में, जहाँ राजनेताओं में थोड़ी-बहुत शर्मो-हया पायी जाती हो, ऐसा नहीं होता होगा। इस रुतबे को कायम रखकर मोदी जी ने यह संकेत दे दिया है अगले पाँच वर्षों में वढेरा के खिलाफ कोई जाँच नहीं होगी- सजा तो भूल ही जाईये! (अब अगर उमा भारती जी ने उँगली भी उठाई वढेरा की तरफ, तो शायद उमा जी ही निष्काषित हो जायें!) यह और बात है कि खुद मोदी जी चुनाव से पहले भाषणों में वढेरा का मजाक उड़ाया करते थे- मगर अब वे उनके भी जमाई राजा हैं!
छठी कील- सुरंग? एक अपुष्ट खबर के अनुसार, 7 आरसीआर से साउथ ब्लॉक तक सुरंग बन रही है मोदी जी के लिए- तकि आम लोगों की उन्हें नजर न लग जाय! यह और बात है कि चुनाव से पहले इन्हीं आम लोगों को अपनी सभाओं में जुटाने के लिए उन्होंने क्या-क्या न पापड़ बेले थे! कोई कहता है, सुरंग का काम मनमोहन जी ने शुरु करवाया था। सच्चाई चाहे जो हो, मगर इतना जान लिया जाय कि ये सुरंग, ये बंकर किसी को परमाणु विकिरण से तो बचा सकते हैं, मगर लोगों की बद्दुआ से नहीं!
सातवीं कील- रक्षा क्षेत्र में एफडीआई। इसपर पहले मैं लिख चुका हूँ (पिछले ही पोस्ट में)। दुहराना नहीं चाहता। सीधी-सी बात, ऐसा चाहने का मतलब है- ....या तो मेरी रगों में दौड़ता हुआ खून सच्चा भारतीय नहीं है; ...या मैं एक कायर हूँ- क्लीव, भीरू; ...या फिर, मैं दुनिया के बड़े-बड़े शस्त्र निर्माताओं से मोटी दलाली पाने का लालच मन में पालता हूँ!
आठवीं कील- मनमोहन नीति। यह सही है कि चुनाव से पहले मोदी जी ने मनमोहन जी की आर्थिक नीतियों के खिलाफ कभी कुछ नहीं कहा था- यानि मौन समर्थन दिया था। मगर बिना कोई बदलाव लाये उनकी नीतियों को फिर से लागू करना कुछ जँच नहीं रहा है। बेकार ही गया फिर तो यह चुनाव!  
अब आज की आखिरी दो कीलें:
नवीं कील- अमेरिकी चौखट पर मत्था। खबर आयी की सितम्बर में मोदी जी अमेरिका जायेंगे। कोई गंगाजी में गले तक पानी में डूबकर कहे कि यह सद्भावना यात्रा है, मगर मैं इसे नहीं मानूँगा। मेरी नजर में इस यात्रा के दो ही उद्देश्य हैं- 1. एक कर्जदार या बन्धुआ मजदूर के अगले वारिस का अपने महाजन की चौखट पर जाकर मत्था टेकना कि माई-बाप, हम स्वावलम्बी या खुद्दार बनने की कोशिश हर्गिज नहीं करेंगे- आपके फेंके टुकड़ों पर ही पलते रहेंगे और 2. अमेरिकी बहुराष्ट्रीय निगमों से चिरौरी कि साहेबान, आईये, अभी भी बहुत सोना बचा है इस अभागे मुल्क में- लूटकर ले जाईये...
दसवीं कील- गैस का दाम दुगना। अम्बानी यही गैस बाँग्लादेश को दे रहा है 2.3 डॉलर में- 17 वर्षों का करार है, मगर भारत सरकार को वह देगा 8 डॉलर में! इसे कहेंगे खुली लूट! जाहिर है, कि चुनाव में जिन उद्योगपतियों ने भी पैसे लगाये थे, सबको सूद सहित पैसे वसूलने का पूरा मौका मोदी जी देने वाले हैं।
***
यानि मेरी अन्तरात्मा ने मोदी जी के बारे में जो संकेत दिये थे, वे सही ही थे। उन्हें शब्दों में कुछ यूँ बयां किया था मैंने- 7 अगस्त 2012 को अपने ही पोस्ट पर आयी एक टिप्पणी के प्रत्युत्तर में:  
मेरा भी राजनीतिक ज्ञान शून्य है. ज्यादातर मैं "मन की आवाज" पर लिखता हूँ. मैं स्पष्ट देख रहा हूँ कि गुजरात तरक्की कर रहा है और सम्भवतः वहाँ के गरीबों का भी जीवन-स्तर शालीन हो रहा होगा; मगर दो बातों के चलते मुझे ऐसा लगता है कि उनके नेतृत्व में बनने वाली सरकार से जनता का मोहभंग होगा- 
1.
जिस प्रकार के क्रान्तिकारी परिवर्तनों (यानि विश्व बैंक, अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष, बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ, अमेरिकी वर्चस्व, देशी पूँजीपतियों/उद्योगपतियों के दवाब के खिलाफ जाने) की जरुरत इस वक्त देश को है, उन्हें भाजपा या मोदीजी लागू नहीं कर पायेंगे.                                    
2. "
मेरा मन" ऐसा कहता है कि जब तक इस देश की जनता की "सारी उम्मीदें" एक-एक टूट नहीं जातीं, तब तक वे "लीक से हटकर" सोचने के लिए तैयार नहीं होंगे. और जब तक लीक से हटकर एक "नयी व्यवस्था" (टेम्प्रोरी ही सही) के बारे में लोग नहीं सोचते- सब कुछ ऐसे ही चलते रहेगा. 
*****
पुनश्च (6/6/14): फिनिशिंग कील

ग्यारहवीं कील- बदायूँ काण्ड पर चुप्पी। आज बदायूँ बलात्कार काण्ड के 10 दिन हो गये। (इस काण्ड के बाद तो मानो झड़ी लग गयी है उत्तर प्रदेश में दुष्कर्मों की!) जहाँ तक मुझे ध्यान है, प्रधानमंत्री मोदी जी ने इस पर न दुःख जताया है, न रोष, न क्षोभ; पीड़ित परिवार के प्रति न संवेदना व्यक्त किया है उन्होंने, न ही त्वरित न्याय का भरोसा दिलाया है। कहा जा सकता है कि इतने बड़े देश में इतना तो होता रहेगा- प्रधानमंत्री भला सब पर अपनी प्रतिक्रिया क्योंकर देने लगे! ठीक है, फिर दामिनी काण्ड पर डॉ. मनमोहन सिंह की चुप्पी को क्यों उछाला गया? खुद मोदी जी ने उन्हें "मौनमोहन सिंह" क्यों कहा? उन्होंने तो फिर भी नवें (या आठवें) दिन अपनी चुप्पी तोड़ दी थी। आपने तो उनका कीर्तिमान भी तोड़ दिया आज! 10 दिन हो गये... और कोई प्रतिक्रिया नहीं!     

सोमवार, 2 जून 2014

173. स्वतंत्र रहने का नैतिक अधिकार


       यह देखते हुए भी कि भारतीय वैज्ञानिकों, तकनीशियनों, डिजाइनरों, इंजीनियरों इत्यादि ने मिलजुल कर हाइड्रोजन बम का निर्माण किया है, सुपर कम्प्यूटर बनाया है, कृत्रिम उपग्रह प्रक्षेपक यान बनाये हैं, अन्तर्महाद्वीपीय बैलेस्टिक सहित दर्जनों तरह के मिसाइल बनाये हैं; अगर मैं यह कहूँ कि ये अपनी सेनाओं की जरुरत के अनुसार रायफल, मशीनगन, तोप, टैंक, राडार, युद्धक विमान, युद्धक जलपोत वगैरह नहीं बना सकते, बल्कि विदेशी शस्त्र निर्माता ही हमारी सेनाओं की जरुरतों को पूरा कर सकते हैं, तो....
       ....या तो मेरी रगों में दौड़ता हुआ खून सच्चा भारतीय नहीं है;
       ...या मैं एक कायर हूँ- क्लीव, भीरू;
       ...या फिर, मैं दुनिया के बड़े-बड़े शस्त्र निर्माताओं से मोटी दलाली पाने का लालच मन में पालता हूँ!
       (यह मेरी अपनी भावना है, किसी और पर लागू होना जरूरी नहीं है।)
       ***
       हाँ, तब है कि भारतीय युद्धक साजो-सामान बनाने वाले विभाग को आई.ए.एस अफसरों तथा राजनेताओं के चंगुल से पूरी तरह मुक्त रखना होगा! मेरी बात पर यकीन न हो, तो 'इसरो' को आई.ए.एस अफसरों के अधीन करके देख लिया जाय, कि दो वर्षों के अन्दर इसकी कैसी दुर्गति होती है! (चन्द देशभक्त, ईमानदार, साहसी आधिकारियों से क्षमाप्रार्थना सहित मैं यह कह रहा हूँ।)
       ***
       अन्त में, मेरा एक सवाल, जिसे मैंने अपने 'घोषणापत्र' में भी उठाया है:
       जो देश अपनी रक्षा-प्रतिरक्षा सामग्रियों का निर्माण/उत्पादन स्वयं ना कर सके, उसे स्वतंत्र रहने का नैतिक अधिकार है? (क्रमांक 50.8)
                ***       
जब वाजपेयी जी के सामने स्वदेशी अर्थव्यवस्था का मॉडल रखा गया था, तो उनका सवाल था- व्हेयर इज द कैपिटल?
फिर इतिहास को दुहराया जा रहा है...
अरे, सांसदों/विधायकों के वेतन-भत्तों-सुविधाओं को चौथाई करो, सरकारी वेतन को आधा करो, लॉकरों की गोपनीयता समाप्त करो, आयकर विभाग/प्रवर्तन निदेशालय/सीबीआई को देशी कालाधन जब्त करने की खुली छूट दो, बैंकों के बड़े कर्जदारों की सम्पत्ति जब्त करो, ऐसे दर्जनों उपाय हैं पूँजी की व्यवस्था करने के लिए.
आवारा पूँजी के भरोसे यह देश कभी सम्मानजनक स्थिति नहीं पा सकेगा दुनिया में.

मुझे लगता है, देश को एक ऐसे राष्ट्रनायक की जरुरत है, जिसका मस्तिष्क यानि जिसकी प्रतिभा सुभाष-जैसी हो और जिसका हृदय यानि जिसकी भावना शास्त्री-जैसी. तभी इस देश में बदलाव आयेगा.