शुक्रवार, 8 जून 2012

"मैं नहीं चाहूँगा कि मेरा बेटा वतन की राह में शहीद हो!"


11/3/2012

      "परमवीर का परिवार: बदहाली का शिकार"- यह शीर्षक है उस आलेख का, जो 11 मार्च के 'हिन्दुस्तान' में छपा है। समाचार परमवीर चक्र विजेता सैनिक अल्बर्ट एक्का के परिवार के बारे में है, जिन्हें अबतक (41 वर्षों के बाद भी) उस 5 एकड़ जमीन पर "कब्जा" नहीं मिला है, जो उन्हें आबण्टित किया गया था।
      हम जानते हैं कि यह सिर्फ अल्बर्ट एक्का की दास्तान नहीं है; ऐसे बीसियों (बल्कि ज्यादा) शहीदों के परिवार हैं, जो इस प्रकार की, या इससे मिलती-जुलती बदहाली झेल रहे हैं। अक्सर पत्र-पत्रिकाओं में इस आशय की खबरें आती रहती हैं। मगर प्रत्युत्तर में सत्ताधारियों या नौकरशाही के कानों जूँ रेंगने की खबर कभी नहीं सुनी गयी।
      इस मामले में भी, अगर दिल्ली सरकार से बात की जाय, तो वह 'राज्य सरकार का मामला' बताकर इससे पल्ला झाड़ लेगी। अगर झारखण्ड सरकार से बात की जाय, तो वह या तो- केन्द्र सरकार के किसी जटिल कानून का हवाला देती नजर आयेगी; या हर मुख्यमंत्री (वर्तमान या पूर्व) एक-दूसरे को जिम्मेवार ठहराता नजर आयेगा; या फिर, सभी मुख्यमंत्री एकजुट होकर एकीकृत बिहार सरकार के मत्थे दोष मढ़ते नजर आयेंगे। मगर शहीद परिवार को आबण्टित जमीन पर कब्जा दिलाने की कोशिश कोई राजनेता / सत्ताधारी नहीं करेगा- इतना तय है!
      जबकि होना तो यह चाहिए कि इस समाचार के प्रकाशित होने के बाद स्थानीय पुलिस एवं प्रशासन स्वतःस्फूर्त होकर चौबीस घण्टों के अन्दर शहीद परिवार को उस जमीन पर कब्जा दिला दे। (सत्ताधारियों या न्यायपालिका द्वारा मामले का संज्ञान लिये जाने से पहले ही!) मगर ऐसा भी नहीं होगा- यह भी तय है!
      ऐसे में, मेरे-जैसा एक आम नागरिक भला यह क्यों चाहेगा कि उसका बेटा या उसकी बेटी सेना में शामिल हो, देश की सीमा की रक्षा करे और वक्त पड़ने पर अपने प्राणों की आहुति देकर अपना कर्तव्य निभाये??? बात 5 एकड़ जमीन की नहीं, शहीद के परिवार की बदहाली की है!
      मैं तो अपने बेटे से कहूँगा- अपनी देशभक्ति साबित करने के लिए सैनिक बनना जरूरी नहीं; बल्कि दो बातों का ध्यान रखते हुए किसी भी पेशे को अपनाकर मातृभूमि के प्रति अपने फर्ज को निभाया जा सकता है- एक, कुछ भी हो जाय (दुहरा दूँ- "कुछ भी" हो जाय), कभी अपने वतन के साथ गद्दारी मत करना; दो, कभी जोंक बनकर भारत माँ की देह से चिपककर उनका खून मत चूसना। (यह और बात है कि मैंने खुद बीस वर्षों तक सैन्य धर्म निभाया है।) मैं उससे कहना चाहता हूँ- पुत्र, तुम्हारे सामने हजारों ऐसे उदाहरण होंगे, जहाँ बड़े-बड़े राजनेता, उच्चाधिकारी, पूँजीपति तथा माफिया-सरगना अपने वतन के साथ गद्दारी करते हुए तथा अपनी ही माँ का खून चूसते हुए आन-बान-शान का जीवन जी रहे होंगे, मगर तुम कभी सच्चाई-ईमानदारी-परिश्रम के रास्ते से विचलित मत होना! 

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