गुरुवार, 11 अक्तूबर 2012

उम्मीद की किरणें...






      अक्सर लोग कहते हैं कि इस देश का कुछ नहीं होने वाला है, मगर मुझे पक्का विश्वास है कि नीके दिन आयेंगे, जब शोषण नहीं होगा... । हालाँकि मैं परफेक्शन पर यकीन नहीं करता। मेरी अवधारणा है कि किसी भी व्यक्ति, समाज और राष्ट्र को 97, 98 या 99 प्रतिशत तक आदर्श होना चाहिए। अगर नीचे गिरते-गिरते यह प्रतिशत 92-93 प्रतिशत तक भी पहुँच जाय, तो चिन्ता नहीं। मगर इससे नीचे गिरना अशुभ है।
हम सोने के उदाहरण से इसे समझ सकते हैं। शुद्ध सोने (100 प्रतिशत) को सन्दुक में रखा तो जा सकता है, मगर इसका उपयोग करना हो, तो इसमें 1, 2 या 3 प्रतिशत खोट मिलाना पड़ता है- मजबूती के लिए।
आज की तारीख में देश में उल्टी स्थिति है- 97, 98 या 99 प्रतिशत हिस्सा खोट है, जबकि शुद्धता 1, 2 या 3 प्रतिशत बची है।
      यही कारण है कि भ्रष्टाचार की खबरों से मीडिया भरा पड़ा है और सदाचार की खबरें बस काले बादलों में बिजली की चमक-जैसी दीखती है- कभी-कभार।
      आज के अखबार में खबर है कि त्रिपुरा के मुख्यमंत्री माणिक सरकार के पास बँगला तथा कार नहीं है। स्टेट बैंक में उनका जो खाता है, उसमें (17 सितम्बर’12 तक) 6,500 रुपये जमा थे। उनका वेतन साम्यवादी पार्टी के कोष में जाता है और कोष से उन्हें 5,000 रुपये प्रतिमाह मिलता है- गुजारे के लिए। सरकारी कार का उपयोग वे सिर्फ दफ्तर जाने के लिए करते हैं। उनकी पत्नी पाँचाली भट्टाचार्य को कहीं आना-जाना हो, तो वे रिक्शे से ही आती-जाती हैं। उनके साथ कोई सुरक्षा गार्ड नहीं होता। वे सेण्टर वेलफेयर बोर्ड से पिछले साल सेवानिवृत्त हुई हैं। जब माणिक सरकार मुख्यमंत्री नहीं रहेंगे, तब उनके पेन्शन से ही उनके घर का खर्चा चलेगा।
      अब मैं कैसे अच्छे दिनों की उम्मीद छोड़ दूँ बताईये?

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